अपनी करनी ते नरक न पाऊँ ठौर 

 

कोई इंसान कितना ही बुरे से बुरा काम करने वाला हो, लेकिन अगर संगत में आकर प्रभु-चर्चा ध्यान से सुनेगा, तो उसका जीवन अवश्य बदल जाएगा| अगर संगत में आकर भी कोई इन्सान महापुरषों के वचनों को सुना-अनसुना कर देता है, तो उसको कोई प्राप्ति नहीं हो पाती| उसके मन की मैल उसी तरह बनी रहती है| जो महापुरषों की आवाज़ को सुनकर उसे धारण कर लेते हैं, वो अपने इस जीवन को सफल कर लेते हैं|

 

संगत के साथ जुड़ने से मन को बल प्राप्त होता है| मन विश्वासी बनता है और निर्मल हो जाता है| साधसंगत जिसको भी प्राप्त होती है उसको बड़े ही भागों वाला गिना जाता है| संत तो संगत करने का करता भी अपने आप को नहीं मानता और यही कहता है कि -

 

तुम्हारी कृपा से भए साधसंग, ऐहो काज तुम आप कियो|

 

कि तेरी कृपा से संतो महापुरषों का संग मिला है| यह कारज तो तूने आप ही किया है, अगर ये भी मेरे पर छोड़ दिया होता तो मैं दुनिया में क्या-क्या करता हूँ, कहाँ-कहाँ जाता हूँ, यह भली-भाँती आप जानते हैं, क्योंकि आप अन्तर्यामी हैं|

 

साधसंगत, प्रभु कृपा से प्राप्त होती है और अगर इसको हम कृपा मान  लेते हैं तो जिन पर कृपा होगी, उनको अगर धन्य नहीं कहा जाएगा, तो क्या कहा जाएगा? जितने भी संत महापुरुष इस संसार में समय-समय पर आए, उनके जीवन भी यही प्रकट करते हैं कि-

अपनी करनी ते नरक न पाऊं ठौर|

 

महापुरुष हमेशा यही कामना करते हैं की संतों से ही हमारा संपर्क बढ़े, महापुरषों से ही हमारा नाता जुड़े और गुरमुखों से मिलाप हो| कहा भी है की -

 

गंगा के संग सलिता बिगरी, सो सलिता गंगा होई निबरी|

बिगरियो कबीरा राम दुहाई, साचु भईओ अन कलाहि न जाई||

 

 

साध संगत! कहने का भाव यह है कि जिस तरह से चन्दन के पास उगी हुई वनस्पति में भी चन्दन की खुशबू आ जाती है| एक गंदा नाला जो बह रहा है, वह विशाल गंगा की शरण लेता है, तो उसी का रूप हो जाता है| एक लोहा पारस को छू जाता है, और फिर वह कंचन बन जाता है|  इसी तरह से संतों की अवस्था को कबीर जी बता रहे हैं की महापुरषों की संगती करके कबीर जी राम का रूप ही हो गए हैं|

 

जिस तरह से कोई पानी में उतर जाता है, तालाब में उतर जाता है, तो फिर सूरज की गर्मी का असर उस पर नहीं रहता और वह ठंडक महसूस करता है, शीतलता महसूस करता है, इसी तरह से जो इस नाम के रंग में डूब जाते हैं, संगत में आते रहते हैं, उनके ऊपर माया की गर्मी भी असर नहीं करती|

 

साध संगत! जो निरंतर, सत्संग में अपने आप को अर्पित किए रहते हैं, वास्तव में उनके जीवन में निखार आता है| उनके मन का विकास होता है, और मन हमेशा ऊँचाइयों की तरफ बढ़ता है क्योंकि उसमें अच्छे गुण भरे जा रहे होते हैं और ऐसा होता है मात्र महापुरषों की संगती के कारण, महापुरषों के साथ के कारण| इसलिए वे अरदास करते रहते हैं की - 

सेई मिलाई जिनां मिल्यां तेरा नाम चित आवे|

 

हे दातार! गुरमुख महापुरषों से ही मिलाप करा, जिनके मिलाप से तेरा ध्यान आ जाता है| तेरी याद बन जाती है, तेरे ऊपर पूर्ण विश्वास कायम हो जाता है|

 

-----निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार  : बुक : विचार प्रवाह भाग-2, पेज 47-48-49