Uploaded on 3rd December, 2012

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गुरु तो बाहें फैलाये खड़ा है! (हिन्दी कविता)

Shri Suhas Raul (Sahitya Visharad)

Sahitya Visharad env Sahitya Aakadami New Delhi ki General Council ke poorv sadasya env varishth hindi anuvadak

Rajbhasha Vibhag, Sachivalaya, Daman-396220

 



गुरु उसको कहते हैं

जो अपने आप में चैतन्य हो!

गुरु उसको कहते हैं,

जो अपने आप में अनन्य हो!

गुरु उसको कहते हैं जो चेतन से सिद्ध हो--

इसलिए प्रेम में प्रसिद्ध हो

गुरु आता है सदैव - विश्व को जगाने के लिए,

इसलिए- बाँहें फैलाए खड़ा है,

शिष्य को सीने से लगाने के लिए!



गुरु ऐसा होता है,

जिसके चरणों को पखारने के लिए,

भक्त के भाव रहते हैं --आतुर

गुरु उसको कहते हैं,

जिसके कंठ से होता है उच्चरित --सदैव ज्ञान का सुर, काश सुने तो कोई ह्रदय से

 सद्गुरु तत्पर है--हर किसी को अपनाने के लिए,

शिष्य को सीने से लगाने के लिए!



गुरु उसको कहते हैं,

जो अपने शिष्य को भी अपने साथ उसकी ऊँगली पकड़कर

उसे परमधाम ले जा सकते हैं.

शिष्य यदि हो जाये समर्पित

उसे मुक्ति पद तक पहुँचा सकते हैं.

गुरु तत्पर है- भक्ति मार्ग समझाने के लिए,

काश शिष्य समझे की --गुरु तो बाँहें फैलाए खड़ा है,

शिष्य को सीने से लगाने के लिए.




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