हे प्रभु!
कवि : श्री हरजीत निषाद, दिल्ली

हे निराकार !
हे  परमपुरुष!
हैं सूरज-चाँद तुम्हारी आँखें,
व्योम उदर धरती है गोद.
जिसमें बैठे हैं, तुम्हारे कोटि-कोटि बच्चे,
लेकर कई नज़ारे.
और अपनी नन्ही हथेलियाँ  तुम्हारे आगे पसरे.
इन हथेलियों पर रख दो - उदारता पूर्वक,
अन्न कण, धन, जल.
हर किसी के श्रम का न्यायोचित फल.
सभी धरतीवासी तृप्त हों!
हों सुखी व् खुशहाल. विचरण करें -
तुम्हारी गोद में लेकर अपने दिल विशाल.
रुदन, रुसवाईयाँ, मायूसियाँ -
कहीं भी न हों धरा पर
ऐसी मेहर कर!
यहाँ सर्वत्र दूध-जल-अन्न कि बहारें हों.
करुणा दया प्रेम कि फुहारें हों.
प्रेम अपनत्व से भर उठे धरा सारी,
महके चहुँ ओर इंसानों कि फुलवारी,
न हो कहीं भी घृणा-हिंसा के बादल,
संघर्ष की विभीषिका
अनाचार के तांडव
थम जाएँ हे दयालु प्रभु!
सर्वत्र प्रेम ही प्रेम हो, हे प्रभु!


Please DO SHARE your views in the FORM GIVEN BELOW
God Bless All is loading comments...