एक प्रार्थना (हिन्दी कविता)

कवि : श्री दीपक सचदेव

Rev. Deepak Sachdev Ji
Rev. Deepak Sachdev Ji

कवि : श्री दीपक सचदेव
भोपाल, मध्य प्रदेश

 

e-mail : deepaksachdev@maanavta.com

इंसान
यह जानता है
की जो भी इस लोक में आया है
उसका अंत होना है - एक न एक दिन I
इसलिए
अगर वह जन्मा है
तो उसकी भी मृत्यु
अवश्य होनी है I
इसीलिए शायद
इसे मृत्युलोक भी कहा गया है I
मानव को उत्पन्न हुए
सैंकड़ों / हजारों सदियाँ हुईं
फिर भी वह
इस विधि / इस कटु सत्य को
समझ नहीं पाया है
इसे
आत्मसात नहीं कर पाया है I
यह लोक
माया / स्वपन / भंवर के सामान है
और मानव उसमें डूबता ही है
फंसता ही है - हमेशा I
कई बार
सच्चाइयां / यथार्थ उसे कचोटता है
अंतरात्मा, चीत्कार कर उठती है
विवेक बारम्बार झंझोड़ता है
की जो तुम देख रहे हो
यह सत्य नहीं है
यह एक स्वप्न्जाल  है / माया है / मृगतृष्णा है
किन्तु मानवमन
अंतरद्वंद में झूलता रहता है
स्वीकृति और अस्वीकृति
आशा और निराशा
स्वपन और यथार्थ के बीच I
छटपटाता  है
इस द्वंद से निकलने के लिए
इसे स्वीकार करता है
फिर संव्य ही इसे नकार देता है I
वह अपने से ही
यानी सत्य से दूर भागना चाहता है
मुंह छिपाए
आज भी साहस नहीं जुटा पाता है
आईना देखने का I
हर सफलता में खुश हो जाता है
उत्सव मनाता है
असफलता से / ग़म से/ मृत्यु से
होता है - निराश / दुखी / भयभीत I
रोते हैं लोग
क्योंकि वह इसके सिवाय
कुछ कर भी नहीं सकते I
रोना उनकी मजबूरी है
उनकी आवश्यकता है
संव्य को भ्रमजाल में
उलझाए रखने की I

वह जानता है
यह कुछ भी सत्य नहीं
शाशवत नहीं I
यह संसार
धोखा है / थोथा है
और यह सुख-दुःख
उपज है - उसके अपने मन की I
शायद वह अँधेरे में पड़ी रस्सी को
सर्प समझ बैठा है I
अपनी अपनी समझ है
अपना अपना दृष्टिकोण
किसी के लिए है - रोना I
तो किसी अन्य के लिए है - रो-न I
इसका कारण
अज्ञान......I
हे मेरे अन्तर्मन
उठो/जागो
अब इस दीर्घ निद्रा को तोड़ दो
समय की पुकार सुनों
शून्य से निकलकर परम  में आओ
खोजो / तलाशो / पहचानो
स्वयं  को I
खोजो अपने अन्दर
तलाशो भीतर
पहचानो
स्वयं को
स्वयं का मिलन ही
सत्य का मिलन है
इस
अनुभूति के पश्चात्
सब द्वंद, अंतरविरोध
क्षीण हो जाते हैं I
संव्य आलोकित होवो
और
अज्ञान के तिमिर में
दीप्त ज्ञान की रश्मि से
आलोकित आनंदित कर दो I
सभी और प्रकाश का उल्लास हो
और हम सब इसमें समाकर
एक हो जाएँ
यही मेरी कामना है
यही प्रार्थना है....I

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