Uploaded on 19th september, 2011

Rev. Deepak Sachdev Ji
Rev. Deepak Sachdev Ji

कवि : श्री दीपक सचदेव
भोपाल, मध्य प्रदेश

 

e-mail : deepaksachdev@maanavta.com

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औपचारिकता (हिन्दी कविता)

कवि : श्री दीपक सचदेव जी

बहुत दिनों के बाद
जब कभी मैं
तन्हा रह पाता हूँ
तब अपने आप से
संव्य से
बात करने का
मौका मिलता है मुझे

सोचता हूँ
कि यह संसार
ऐसा क्यूँ है?

इतना दिखावटी
इतना झूठा
इतना औपचारिक
अपनत्व से दूर
यथार्थ से बिलकुल परे I

यहाँ
छुपे बैठे हैं लोग
मुखौटे ओढ़े
छुपा है यथार्थ
सिमटा लिया है सबने
संव्य को
अपने में I

सिकुड़ गया है
सिमट गया है
अपनापन/मनुष्यता
सब कुछ I

शायद शहर में
मनुष्य / मनुष्य कम
'शहरी' अधिक हो गया है I

आज
मनुष्यता गौण हो गई है
'शहरी' औपचारिकता
प्रधान है

उठने की/बैठने की
स्वागत की/सर हिलाने की
'शहरी' होने की
और इस सब में
मनुष्य पता नहीं कहाँ
खो गया है...I

किन्तु
जीवित है
जारी है
सर्वत्र
यह नाटक
ऊपरी दिखावा
पाखण्ड
एक औपचारिकता मात्र
मंतव्य कुछ भी नहीं I

सतही हो गया है मनुष्य
संव्य अपने आप में
अन्दर ही अन्दर घुट रहा है
दोगलेपन से

और
इस क्रम में
शायद
अपने आपको ही
छल रहा है आदमी...I


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