Click here for MORE POEM by Sardar Bikramjit Singh 'Jit' Ji
Sardar Bikramjit Singh 'Jit' Ji

Poet : Rev. Bikramjeet Singh 'Jit'

 

E-mail : bikramjitsingh@maanavta.com


फनियर नाग पांच इस मन में जो कुंडल मारे बैठे हैं

(ਬਿਕਰਮਜੀਤ ਸਿੰਘ "ਜੀਤ" E-mail : bikramjitsingh@maanavta.com )


फनियर नाग पांच इस मन में जो कुंडल मारे बैठे हैं   

डेरा इनका लगा है पक्का ज़हर भरे यह अति के हैं 

बुद्धी भ्रष्ट की इन पांचो नें खा खा डंक हैं हुए बेहाल 

कैसे मिले निदान अब इनसे टूटे कैसे पड़ा यह जाल 

 

पहला नाग आँख का अँधा कामदेव इसे कहे जहान 

इसकी पकड़ से बचा न कोई बलधारी या बुद्धिमान 

डस कर अंधे कर दिए इसने कई धर्मी व् शक्तिमान 

दामन उजला रख न पाए कई मुनी और ऋषि महान 

 

ज्वालामुखी है नाग दूसरा पारा इसका छुए आसमान 

नाम क्रोध सब कहते इसका खूंटे टाँगे  सबकी जान 

सबके होश उड़ा देता जब आग उगलता यह शैतान 

काम कोई पूरा हो न पाए, जब हमला करदे यह हैवान 

 

लालच भरा है नाग तीसरा जी हाँ लोभ है इसी का नाम 

दिखे शांत पर है यह कमीना खतरनाक सब इसके काम 

निगले पैसा वस्तू पर की, हथिया ले खेत मकान पराये 

नहीं अंत इसकी हवस का दिनप्रति और भी बढती जाये 

 

चौथा नाग भांति ध्रितराष्ट्र संजीदा यह हद का है जी 

मोह है यह सब इसकी पट्टी बांध आंख पर जीते हैं जी 

माया मोह संतान की ममता बंधे समस्त नर नारी जी 

भूले धर्म कर्म जब प्राणी तब डस ले नाग यह भारी जी   

 

हर्णकश्यप सा नाग पांचवां फूला फिरे यह मैं मैं करता 

कहते सब अहंकार इसे यह गर्दन ऊंची हरदम रखता 

मलिक भागों बन जाये जिसे यह डस ले नाग गुमानी 

खुद को कहे प्रभु से ऊंचा जिसे काट ले यह अभिमानी 

 

स्वयं नाग यह हमने पाले दुष्कर्मों का सब यह फल है 

परमेश्वर जब बिसर जाये तो इनका आना निश्चित है 

ले आएं साथ कलेश रोग दुःख अकेले कभी न आएं यह 

उड़े ख़ुशी व् सुख समृद्धि 'गर नाग अन्दर बस जाएँ यह 

 

आओ यतन करें कुछ ऐसा इन नागों से अब जान छुडाएं 

जला के प्रभु नाम की  धूनी यह अजगर सारे मार भगाएँ

करके स्वच्छ बर्तन यह मन का भरलें इसमें अमृत नाम 

"जीत"कर्म सब शुभ करें हम लोक परलोक जो आवें काम

God Bless All is loading comments...