मुर्शिद से इश्क लड़ा कर तो देखो

कवि : श्री भूपिंदर सेठी 'अमन'

मुर्शिद से इश्क लड़ा कर तो देखो
सजदे में सर को झुका कर तो देखो |

बन जायेगा तुम्हारा गम-गुसार ये मुर्शिद,
खुदी इनके आगे मिटा कर तो देखो |

कायल न हो जाओ तो कहना मुझसे,
ज़रा दामन को अपने फैलाकर तो देखो |

हजूम राज़े-हक का उमड़ रहा है सीने में,
ज़रा नजदीक मुर्शिद आ कर तो देखो |

तुमको फरेब की दुनिया से क्या होगा हासिल,
ज़रा मोहब्बत में इनको आजमा कर तो देखो |

जब उल्फत का मसीहा है साथ अपने,
'अमन' इन पर अकीदा लाकर तो देखो |

भटकी हुई रूह को भी करार मिलेगा,
बज़्म-ए-मुर्शिद की आ कर तो देखो |