Uploaded on 6th March, 2012

Shri Ashwani Kumar 'Jatan'
Shri Ashwani Kumar 'Jatan'

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इंसान बदलता जा रहा (कविता)

कवि : श्री अशवनी कुमार 'जतन


आदमी क्यो आज काइतना बदलता जा रहा
जो हक़ीक़त है नहीउससे बहलता जा रहा 

झूठ सच में अब इसेदिखता नही कुछ भेद है
या खुदा ये कौन से, साँचे में ढलता जा रहा

ये शिकायत से भरादिन रात करता है गिला
देखके सुख चैन औरों कामचलता जा रहा

फर्क पड़ता है नहीआँसू बहें जो और के
सुख हैं मेरे कमयही कह कर पिघलता जा रहा

दूसरों के काम आनाये भी कोई काम है
सोच ऐसी लेके येभव में फिसलता जा रहा

सच से कोसो दूर होकेवक़्त से मजबूर होके
इस जहाँ में रात दिनयूँ ही टहलता जा रहा

या खुदा ये इल्तेजा हैतेरे दम से ये फ़िज़ा है
तू "जतनजब साथ है तोक्यो  दहलता जा रहा

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