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ये सूरत बदलनी चाहिए

हिन्दी आध्यात्मिक सम्पादकीय


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ये सूरत बदलनी चाहिए

सम्पादकीय

------Shri Ram Kumar 'Sewak'

 

जन्म के आधार पर भी बहुत लोग महान हो जाते हैं| ब्राह्मण का बेटा सदा ब्राह्मण ही रहता है , भले ही चमड़े के जूते बेचने का व्यवसाय ही क्यों न करता हो जबकि शूद्र हमेशा शूद्र ही माना जाता है ,चाहे वह स्कूल में शिक्षक ही क्यों न हो |यदि वह समर्थ है तो उसके मुह पर कोई कुछ नहीं कहता लेकिन पीठ पीछे उसकी बुराई खूब होती है |

 

यदि ब्राह्मण का बेटा सिर्फ ब्राह्मण का बेटा होने के कारण सम्मान पाता है तो ब्राह्मण कुल में पैदा होना उसके लिए एक बड़ा वरदान है |इसके विपरीत शूद्र माता -पिता के घर पैदा होना उसके लिए बहुत बड़ा अभिशाप बन जाता है जो शिक्षक होने के बावजूद सम्मान की बजाय अवमानना का पात्र समझा जा रहा है |

इसके कारण उसे जीवन भर प्रताड़ित होना पड़ता है|शूद्र मानी जाने वाली जाति में उत्पन्न हुए डॉ. आंबेडकर महान विद्वान और देशसेवक होने के बावजूद अभी तक वह सम्मान नहीं प्राप्त कर सके हैं -जो वे तब प्राप्त करते ,यदि वे ब्राह्मण अथवा अन्य सम्मानित मान्यता वाले कुल में पैदा होने पर पाते |

इसे मैं एक विडंबना मानता हूँ कि इंसानो के कर्म से ज्यादा उसके जन्म को महत्व दिया जाता है जबकि जीवन जन्म से केवल शुरू होता है |जन्म और मृत्यु के मध्य जो समय है ,उसमें कोई इंसान कैसे कर्म करता है उसी पर जीवन के सही मूल्यांकन का अस्तित्व टिका है लेकिन व्याहारिक विसंगति के कारण हमारे देश में तो माँ-बाप के नाम पर ही इंसान शासक तक बन जाते हैं |किस-किस का जिक्र करू अनेक नेता तो सिर्फ माँ-बाप के सत्कर्मो के बल पर ही राजनीति कर रहे हैं |खुद उन्होंने देश को क्या दिया है -उसे तो समय भी शायद ही बता सके क्यूंकि कुछ भी तो नहीं किया |

 

इंदिरा जी की कोख से पैदा हुए दोनों पुत्र-राजीव और संजय देश के प्रभावशाली व्यक्तियों में रहे हैं |राजीव गांधी तो प्रधानमन्त्री भी रहे |ज़रा सोचकर देखें कि यदि श्री राजीव गांधी इंदिरा जी के बेटे नहीं होते तो क्या तब भी वे प्रधानमन्त्री बने होते या देश के बड़े नेताओ में उनका शुमार होता ?वो तो संभवतः एक विमानचालक ही रहे होते | कम्प्यूटर्स के रूप में बेशक राजीव जी का इस देश को बहुत योगदान है -मेरे कहने का भाव मात्र इतना है कि माता-पिता की विशिष्ट स्थिति के कारण कुछ व्यक्ति जन्म से ही विशिष्ट माने जाते है -राजीव जी ऐसे ही व्यक्ति थे |यह संतोष की बात है कि वे उदार थे और संकीर्ण जातीय भावनाओं से ऊपर उठ चुके थे |

 

यहाँ देखने की बात यह है कि हर मनुष्य का शरीर एक जैसे पांच तत्वों से निर्मित है-मिट्टी ,,अग्नि,जल,वायु तथा आकाश |छठी है-आत्मा ,जो परमात्मा की अंश है | आत्मा न स्त्री होती है न पुरुष क्यूंकि यह एक नूर है जो जीवन को गति देता है |सम्पूर्ण अवतार बानी के अनुसार-

इक्को नूर ए सभ दे अंदर-नर है चाहे नारी ए

ब्राह्मण-खत्री-वैश-हरिजन इक दी खलकत सारी ए |

 

जब सबका पिता एक परमात्मा है तो फिर आपसी भेद-भाव की गुंजाइश कहाँ बचती है |एक पिता की संतानो में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि वे आपस में बहन-भाई होते हैं |इस सच्चाई के बावजूद मानव-मानव में भेद-भाव बहुत ही पीड़ादायक है }वास्तविकता यह है कि जब इंसान इस दुनिया में आता है तब उसके शरीर पर इस प्रकार का कोई चिन्ह नहीं होता जिसके आधार पर उसे ऊंची या नीची श्रेणी में डाला जा सके |इससे स्पष्ट है कि परमात्मा की तरफ से उंच- नीच की कोई व्यवस्था नहीं है |स्पष्ट है कि मानव-मानव के बीच भेद-भाव की बिलकुल गुंजाइश नहीं है |

 

न जाने सबसे पहले किस व्यक्ति ने इंसान-इंसान के बीच यह बँटवारा किया होगा जिसका दुष्परिणाम अभी तक लोगों को भुगतना पM+ रहा है | वह इंसान निश्चय ही अमानवीय रहा होगा जिसने एक बहुत बड़े समुदाय को इतना प्रताड़ित किया कि अभी तक वे उस कुंठा से ऊपर नहीं उठ सके हैं |

उच्च और निम्न का फासला इतना बड़ा है कि समानता आ नहीं पा रही है |अनेको क़ानून भी बने हैं लेकिन क़ानून तो तब अस्तित्व में आते हैं जब मामला पुलिस में पहुंचता है और गरीब आदमी वकील की फीस भरे या रोटी खाए ?जीवन बचाना जरूरी है तभी तो आत्मसम्मान का भी कुछ अर्थ है इसलिए वह पेट भरना ज्यादा ठीक समझता है झगड़ा बढ़ाने की बजाय |जीवन तो बचे फिर सम्मान बचाने की बारी आती है |

 

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बदायूं में जो अनाचार हुआ ,उसकी गूँज संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुँची लेकिन जाति के नाम पर अपनी स्त्रियों का सम्मान न बचा पाने वाले पीड़ितों को कौन बचाएगा ?

 

जिन पर उन्हें बचाने की जिम्मेदारी है वे तो निष्ठुर लोग हैं और संवेदनशीलता को वे उसी प्रकार त्याग चुके हैं जिस प्रकार पतझड़ में पेड़ पत्तो को त्याग देता है |जहाँ नफरत ही नफरत भरी है वहां से सुरक्षा की आशा रखनी व्यर्थ है |मेरा कहना मात्र इतना है कि इस हिंसा और अनाचार का कारण भी जातीय नफरत ही है |इस नफरत से बचने की ज़रुरत है लेकिन इस ज़रुरत को कौन पूरा करेगा -क्या बड़े-बड़े नेताओं के भाषण ? क्या संसद द्वारा बनाये गए मजबूत क़ानून या घड़ियाली आंसू ?इनमें से कोई भी यह काम नहीं कर सकता क्यूंकि नफरत का अन्धेरा तब ख़त्म होता है जब प्रेम का उजाला शुरू होता है |यह प्रेम का उजाला कब और कैसे सब तक पहुंचेगा ,यह तो समय ही बता सकता है लेकिन इसकी शुरुआत तुरंत होनी चाहिए |यह काम सरकार का नहीं समाज का है कि पीडि+तोaS को होसला दे कि -अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है और कोई भी प्रगतिशील समाज किसी को टुकड़ो में बांटकर नहीं देखता बल्कि मानव को मानव के रूप में पहचानता है और महत्व देता है |यदि समाज ऐसा प्रगतिशील दृष्टिकोण अपना सके तो सुधार की कोई गुंजाइश बनती है अन्यथा मुझे महान शायर निदा फ़ाज़ली साहब का यह शे;र यहाँ बहुत प्रासंगिक नज़र आता है कि-

अब तक जो होता आया है -वो ही होना है

जीवन क्या है चलता - फिरता एक खिलोना है |

यक्ष प्रश्न एक ही है कि-आखिर कब तक ऐसा चलेगा ?महान कवि दुष्यंत कुमार के शब्दों में -

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

जिस तरह बदले मगर सूरत बदलनी चाहिए |