सूफियत का रहस्य

सम्पादकीय

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Uploaded on 13th March, 2013


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सूफी दर्शन के सम्बन्ध में जितना भी मैंने पढ़ा-सुना है, उससे लगता है की सूफीयत एक रूहानी अवस्था है। एक ऐसी अवस्था जब की बूँद का सागर में विलय हो जाये। इतना गहरा प्रेम की हालत ऐसे हो जाये - तू-तू- न रहे, मैं - मैं न रहूँ, इक-दूजे में खो जाएं । 

एक बूँद जब सागर में मिल जाये तो फिर उसका पुन: पुरानी अवस्था में लौटना संभव नहीं है, सूफीवाद या सूफी दर्शन भी ऐसी ही अवस्था है। 
सतही तौर पर देखें तो सूफी, प्रेमी व्यक्तित्व के स्वामी नज़र आते हैं । वे कभी संवय को आशिक मान लेते हैं हैं तो कभी संव्य को माशूक, दोनों ही अवस्थाओं में प्रेम की विराटता स्पष्ट है । 
इस सम्बन्ध में मुझे भगवन कृष्ण की याद आती है। भगवान् कृष्ण का व्यक्तित्व भी विलक्षण प्रेमी का रहा है । भीष्म भी उन्हें प्रेम करते थे और भीष्म की माता सत्यवती भी, जब की श्री कृष्ण की शारीरिक आयु भीष्म में पौत्रों की आयु के आस-पास की थी । यह जैसे पहली और तीसरी पीढ़ी का मेल था । 
कृष्ण का व्यक्तित्व कुछ अलग ही प्रकार का था, बचपन में वे माखन चुराते थे । माखन चुराते-चुराते कब वे गोप-गोपिकाओं का मन भी चुरा बैठे, किसी को पता न चलता । 
उसके बाद वे राजनीतिज्ञ की भूमिका में आ गये। कंस का संहार करके मथुरा को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया । कौरवों-पांडवों को आपस में मिलाने की कोशिशें की और कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश दिया । इस पावन ग्रन्थ में विशुद्ध ज्ञान है और निराकार प्रभु की सत्ता को पूरी तरह स्पष्ट किया गया है । 
सूफीयत को समझने में हमें श्रीकृष्ण का वह रूप मदद करेगा जिसमें भोले-भाले गोप-गोपियाँ हैं और खुद उनके ही परिवार के एक सदस्य के रूप हैं - श्रीकृष्ण, जिन्हें वे लोग कान्हा कहकर पुकारते थे और सबसे ज्यादा अपना मानते थे। 
उसी समय का प्रसंग है -भगवान् कृष्ण ने पेट में दर्द का बहाना बनाया और करूँण  पुकार करने लगे" भक्तजनों ने या कहिए प्रेमियों ने पूछा की पेट दर्द कैसे दूर होगा? इस पर श्री कृष्ण बोले की इसका एक यही उपाय है की कोई अपना चरणामृत बनाकर मुझे पिलाये । 
यह सुनना  था की हर कोई एक-दूसरे के मुख् की और देखने लगा की श्रीकृष्ण तो संव्य प्रभु हैं । वे उनके तारणहार हैं, उनके हर दुःख के उपचार हैं, उनके लिए चरणामृत कौन  बना सकता है? उनसे ज़्यादा क्षमता किसी में है ही नहीं । गोप-गोपिकाओं का मानना था की  चरणामृत उपलब्ध कराने वाले को तो उनसे ऊंची अवस्था वाला होना चहिए। साथ ही यह डर भी था की उनके लिए चरणामृत बनाने से कहीं पैर ही न गल जाएं । इतने बड़े महापुरुष के लिए चरणामृत बनाना भी अपराध न हो जाये । सबने कहा की हम यह काम नहीं कर सकते । 
कहते हैं की अंत में राधा को यह खबर मिली की कृष्ण के पेट में दर्द हैं और वह दर्द चरणामृत से ही ठीक होगा । राधा ने कहा विलम्ब मत करो, तुरन्त चरणामृत बनाओ । 
संगी-साथियों ने डराया की कहीं तुम्हारा कोमल पैर गल गया तो? राधा ने कहा की चाहे पूरा शरीर ही क्यों न गल जाये, कृष्ण का दर्द दूर होना चहिए। इसे कहते हैं इश्क! किसी शायर ने क्या खूब लिखा है - 
जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सजके । 
जान-अंजान का ध्यान भुलाके, लोक-लाज को तजके । 
वन-वन डोली जनक दुलारी, पहनके प्रेम की माला । 
दर्शन जल की प्यासी मीरा, पी गयी ज़हर का प्याला,
और फिर अर्ज़ करी --लाज राखो-लाज-राखो........ 
दर्द का तो बहाना ही था, वास्तव में तो प्रेम की गहराई नापने का उपाय करना था । 
कृष्ण के साथ नाम जुड़ता है तो राधा का । मीरा तो बहुत बाद में हुई लेकिन जहाँ शरीर के गलने की भी चिंता ख़त्म हो जाये, वह प्रेम की पराकाष्ठा है, और वह सूफीवाद की और ले जाती है । 
सूफी, भक्ति की प्रेममार्गी शाखा है । वहां प्रेम, ज्ञान पर हावी है । एक गीत की पंक्तियाँ  याद आती हैं :
यारा ओ यारा,  इश्क़ ने  मारा, हो गया मैं तो तुझमें तमाम। 
दे रहे सब मुझे तेरा नाम, मैं बेनाम हो गया..... 
अपने नाम को ख़त्म कर देना यानि की अपने आपको ख़त्म कर देना, आसान काम नहीं है । अपने नाम के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते ? किले बनवाते हैं, बाग़ लगवाते हैं, शहर तक बसा देते हैं । दान करते हैं साथ ही अपने नाम का पत्थर भी लगवा देते  कई बार भक्ति के नाम पर यह सब कुछ करते हैं लेकिन नाम का सम्बन्ध भक्ति के साथ है ही नहीं । नाम चमकाने के भाव में तो पूरी सांसारिकता निहित है । 
हम लोग लेख लिखते हैं, कविताएं, गीत-पुस्तकें लिखते हैं, भावभिव्यक्ति के साथ-  लालच भी तो जुड़ा ही रहता है । भक्ति मार्ग की दृष्टि से यह एक कमज़ोरी है और सूफीयत में तो इसका प्रवेश भी नहीं हो सकता । 
पंजाब के प्रसिद्ध प्रेमी हीर-रांझा में, रांझा तो पुरुष था, जब की हीर स्त्री थी । जहाँ तक मुझे समरण हैं, हीर-रांझा, वारिस शाह जी ने लिखी है । हीर के प्रेम की विराटता दर्शाते हुए शायर कहता है -
रांझा-रांझा करदी नी मैं  आपे रांझा होई । रांझा मैं विच, मैं रांझे विच, होर ख्याल न कोई । 
शायर धर्म सिंह जी 'शौक़' के शब्दों में -
मैं वी  हाँ ते तूं  वी ए, एह गल कुझ जचदी नहीं, मैनूं आपणी होंद तों इंकार करना पयेगा । 
 
शायर धर्म सिंह जी 'शौक़' साहब जिस मार्ग की और संकेत कर रहे हैं, हीर वहां पहुँच चुकी है । 
आगे शौक़ साहब लिखते हैं : 
दरबार में सच्चे सतगुरु के इक जाम पिलाया जाता है,
इक नशा उतरा जाता है, इक नशा चढ़ाया जाता है। 
यह वहदत (अध्यात्म) का जाम है, जिसे सतगुरु पिलाता है । इस जाम को पीकर भाँति-भाँति के कारणों से उत्पन्न अहंकार का नशा उतर जाता है, और जो नशा चढ़ता है, वह निरा इश्क होता है, सूफीयत होती है । शायर ने लिखा है - 
अल्लाह और रसूल का फरमान इश्क है । यानि हदीस  इश्क है, कुरआन इश्क है । 
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क है । यह कायनात इश्क है और जान इश्क है। 
इश्क सरमद, इश्क ही मंसूर है। इश्क मूसा, इश्क कोहेतूर है। 
ख़ाक को  बुत और बुत को देवता करता है इश्क । 
इन्तहा ये है की बन्दे को खुद करता है इश्क । 
शायद ऐसी ही किसी अवस्था में किसी शायर ने लिखा -
आदम को खुदा मत कहो, आदम  खुदा नहीं । 
लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं । 
इश्क की गहराई हमें आमिर खुसरो और हज़रत निज़ामुद्दीन की याद दिलाती है । 
आमिर खुसरो को अपने गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन से बहुत गहरा प्रेम था । उतना ही प्रेम हज़रत निज़ामुद्दीन को भी उनसे था । कहते हैं की हज़रत निज़ामुद्दीन ने खुसरो के बारे में अपने शिष्यों को कहा था की मेरी मैयत (अर्थी) के पास खुसरो को मत आने देना । कहीं ऐसा न हो की उसे देखकर मैं मैयत (या कब्र) में से (भी) उठ खड़ा हो जाऊँ । यह दो तरफ़ा प्रेम था । खुसरो को जब अपने गुरु के देहांत का पता चला तो उन्होंने लिखा :
गोरी सोवे सेज पर सर पर डाले केश,
चल  खुसरो घर आपने, रेन भाई चहुँ देश । 
 
चरों और घना अन्धकार । यह होता है - विरह । 
जैसे मछली जल के बिना, कुछ इसी प्रकार की अवस्था है यह। यह अवस्था जब एकमात्र  खुदा के प्रति होती है की तो यह विरह भी भक्त को मुक्ति की उँचाई प्रदान कर देता है । 
इश्क की उँचाई ही सूफीयत का रहस्य है । 

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