अशांति का इलाज - परोपकार



आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा को तरक्की का मूल माना जाता है|हमारी पीढ़ी ने अपनी अगली पीढ़ी को यही संस्कार दिये हैं |नयी पीढ़ी प्रतिस्पर्धा में उलझी है |रात होते-होते वह मानसिक रूप से बहुत थक जाती है इसलिए नींद के लिए भी नशे का सहारा लेना पड़ता है |लड़के-लड़की दोनों की गाड़ी अलग-अलग track पर दौड़ती है और शादियाँ भी अक्सर कम टिक पाती हैं क्यूंकि प्रतिस्पर्धा वहां भी रहती है इसलिए बेशक सांसारिक तरक्की का मूल प्रतिस्पर्धा है लेकिन अशांति का मूल भी यही है |जिन्होंने इस अशांति के नकारात्मक भाव को महसूस किया उन्होंने इसके साथ शब्द जोड़ा-स्वस्थ यानी कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा |इसका अर्थ यह है कि प्रतिस्पर्धा तो हो लेकिन गलाकाट न हो |


कुछ दिन पहले सत्संग में जिन सज्जन ने विचार किये वे कॉर्पोरेट जगत से जुड़े हैं | उन्होंने इस व्यवसाय की प्रतिस्पर्धा का भली -भांति जिक्र किया |साथ ही सहजता का भी जिक्र किया |सहजता ,जो कि अध्यात्म की पैदाइश है |जिसमें उतावलेपन की गुंजाइश नहीं है |


प्रतिस्पर्धा में दौड़ है |हर कोई एक -दूसरे से आगे निकलना चाहता है इसलिए ईर्ष्या भी जरूर है ,नाम बेशक कोई और दे दें |दौड़ में तो थकान ही होती है इसलिए बहुत धनी व्यक्ति अक्सर काफी रोगों से घिरे होते है |अध्यात्म की गहराई में उतरने का उनके पास समय नहीं होता |


जो अध्यात्म की गहराई में होते हैं उनके पास अक्सर सहजता और शांति तो होती है लेकिन अक्सर बहुत पैसा नहीं होता क्यूंकि ज़रुरत महसूस नहीं होती |वे अक्सर कहते हैं-
साईं इतना दीजिये ,जामें कुटुंब समाँय,मैं भी भूखा न रहूँ साधु भी भूखा न जाय |
जहाँ तक मुझे समझ आता है अध्यात्म पैसा कमाने के खिलाफ नहीं है लेकिन उस पर अपना हक़ ज़माने के खिलाफ है |यदि धनी व्यक्ति परोपकार में भी अपनी आय का कुछ प्रतिशत खर्च करें तो वह अध्यात्म की गहराई को भली भाँति महसूस करेगा और समय भी ज्यादा नहीं लगेगा |शांति के लिए नशे की नहीं मनोवृत्ति बदलने की ज़रुरत होती है |आपका क्या ख्याल है ?