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अपने ऊपर नज़र रखें (watch yourself) 

हिन्दी आध्यात्मिक सम्पादकीय


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अपने ऊपर नज़र रखें (watch yourself) 

सम्पादकीय


अपने ऊपर नज़र रखें(watch yourself) 

     कहते हैं कि-

सब सखिया पाणी भरण को आइयाँ -कोई-कोई मुड़सी भरके

,जिसकी गागर भर गयीं वो पैर धरण डर-डर के |


       अध्यात्म में इसके अर्थ गहरे हैं |कहते हैं कि गुरु के पास सब शिष्य ज्ञान प्राप्त करने आये लेकिन हर कोई ज्ञान प्राप्ति नहीं कर पाया |केवल कोई - कोई  ब्रह्मज्ञान प्राप्ति कर पाया | जिसने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया फिर वह पैर आगे बढ़ाता है-डरते - डरते |

बाबा अवतार  सिंह जी महाराज फरमाते हैं कि-


भूल-भुलेखे वी जे भुल्ले साह ओहदा सुक जाँदा


यानी  भूल से भी यदि कोई भूल(दोष) हो जाए तो वह घबरा जाता है कि यह क्या हो गया ?ऐसा व्यक्ति सदैव सावधानीपूर्वक जीवन जीता है और जिओ और जीने दो की नीति अपनाकर खुद भी सुखी रहता है और औरों को भी सुख प्रदान करने में सहायक बनता है |इस प्रकार उसका घबराना भी पॉजिटिव रहता है |

      हालांकि घबराना कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन आध्यात्मिक व्यक्तियों का घबराना उन्हें पाप से दूर रखने में सहायक होता है इसलिए उनकी घबराहट भी सकारात्मक होती है |

       यह घबराना एक प्रकार का सचेत रहना है -जैसे जिनकी गागर भरी होती है वे पैर रखते समय यह ध्यान रखती हैं कि पैर कहीं फिसल ना जाए नहीं तो पूरा पानी कीचड का रूप ले लेगा -पीने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा |

      संत -महात्मा भी यह ध्यान रखते हैं कि यदि मन-वचन अथवा कर्म के धरातल पर कोई पाप हो गया तो जीवन में दाग लग जाएगा और भक्ति चली जायेगी |

कबीर दास जी और थोड़ा आगे चले गए-उन्होंने कहा-


सुखिया यह संसार है-खावै अरु सोवै|

दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै|


कबीर दास जी खुद को दुखियो की श्रेणी में रख रहे हैं जबकि वे परम भक्त थे और हरि  से उनका नाता इतना गहरा था कि एक पद में वे कहते हैं कि-

पाछै लगा हरि  फिरे  -कहत कबीर - कबीर |

एक तरफ इतना प्रबल विश्वास और दूसरी तरफ कह रहे हैं स्वयं को दुखी |आईए विचार करें-

          संसार खुद को सुखी मान रहा है क्यूंकि लोग मनमानी करने में लगे हैं -खाने और सोने के अलावा कोई काम नहीं |जब जागते हैं तो नमक-तेल-लकड़ी के खेल में लगे रहते हैं यानी पेट भरने का प्रबंध बाकी समय नींद का आनन्द यानी कि लोक की चिंता परलोक की |ऊपरी तौर पर कोई चिंता नहीं लेकिन शान्ति भी नहीं क्यूंकि आँख मूंदकर सो जाने से समस्या ख़त्म नहीं हो जाती |कबीर दास जी यदि दुखी हैं तो इन गफलत की नींद लेने वालो की चेतन रहने की आदत के कारण ,जो कि लालच की अग्नि में ईंधन डालते रहते हैं |उनका कोई अपना दुःख नहीं है बल्कि वे संसार की अज्ञानता के कारण दुखी हैं |

          जिनकी गागर में प्रभु का ज्ञान भरा है वे सिर्फ इस कारण डरे रहते हैं कि जीवन की चादर पर कोई दाग लग जाए |कोई कर्म ऐसा हो जाए कि  जीवन की चादर मैली हो जाए और गुरु के सामने यह शर्मिंदगी महसूस होती रहे कि-

मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं ?

कवि कहता है-

लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे ?


दाग लग गया तो चिंताओं की सूची में एक चिंता यह बढ़ जाती है कि दाग तो लग गया -यह दाग हट भी नहीं सकता तो ज़रुरत रह जाती है-उस दाग को छिपाने की |

       एक सवाल यह भी है कि दाग छिपाना किससे है ? क्या दुनिया से ?दुनिया के लिए दागो की चिंता करने की ज़रुरत नहीं है क्यूंकि दुनिया में तो दाग ही दाग हैं |लगभग सब दागी हैं इसलिए दुनिया में दाग-धब्बो की अब कोई परवाह ही नहीं करता |उनकी कोई अब चर्चा भी नहीं करता क्यूंकि जिनके घर शीशे के हों वे दुसरे के घरो पर पत्थर नहीं फेंका करते |वे एक -दुसरे के दागो को नज़रअंदाज़ करते हैं और इस प्रकार समझदारी का परिचय देते हैं लेकिन यह पूरी की पूरी समझदारी असत्य के प्रति है इसलिये ये समझदार लोग ज़िंदगी भर दुखी रहते हैं |

        इनका दुःख भीतरी रोग है |गुम चोट की भाँति  ये दागो का दर्द महसूस कर रहे हैं और उस आदमी की भाँति  हैं जो भगवान के कारण बहुत दुखी था क्यूंकि भगवान का नाम लेकर उसे नैतिकता के रास्ते पर चलते रहने की प्रेरणा दी जाती थी |वह नैतिकता की बजाय मनमानी के रास्ते पर चलना चाहता था लेकिन भगवान के बीच में जाने के कारण उधर जा नहीं पा रहा था इसलिए एक दिन उसने अखबार में छपवा दिया कि  कल रात भगवान मर गया |उसकी नज़र में अब वह नैतिकता के मार्ग पर   चलने और मनमानी करने के लिए स्वतंत्र था |अब वह बहुत खुश था लेकिन क्या कभी भगवान की मौत होती है ?

       इस प्रकार उसकी खुशफहमी निराधार थी |भीतरी तौर पर वह अब भी दुखी था क्यूंकि अखबार में  छप जाने के बावजूद यह बात सच थी और यह असत्य ही उसके दुखी होने का कारण था |

संत-महात्मा चूंकि मन-वचन-कर्म से सत्य को स्वीकार करते हैं इसलिए बहुत संतुष्टि के भाव से इस जगत में विचरण करते हैं क्यूंकि वे पाप से दूर रहकर सहज जीवन व्यतीत करते हैं इसलिए बेहतर है कि हम सच्चे मार्ग का अनुसरण करें |कोशिश करें कि हमसे कोई काम ऐसा हो जो हमें मानवता की दृष्टि से नीचे गिराने वाला हो |     इस प्रकार मानवता का सिर ऊंचा रखेंगे तो फिर दाग-धब्बो से भरी दुनिया में विचरण करने के बावजूद हम इस दुनिया से बेदाग़ जा सकते हैं |इसके लिए बस इतना ही ज़रूरी है-watch yourself अर्थात अपने ऊपर नज़र रखें कि कोई काम ऐसा ना  हो जाए कि  पछताना पड़े |

                                                                                            -रामकुमार सेवक