आध्यात्मिक जाग्रति




सद्गुरु बाबा जी की बातों पर कान व् ध्यान देनों देने की आवश्यकता है तभी हम अध्यात्म को समझ पाएँगे और जाग्रति को भी| वह जागना भी क्या जागना की आँखें खुली हों और आदमी गड्ढे में गिर जाये|

 

78 वर्ष का लम्बा अंतराल हो चुका है, संत निरंकारी मिशन को प्रारम्भ हुए| पूज्य बाबा जी जहाँ भी जाते हैं, हजारों-लाखों का जनसमूह एकत्र होता है| इस जनसमूह में से लगभग सभी जाग्रत दिखाई देते हैं लेकिन वास्तव में जाग्रत कितने हैं? बाबा जी तो पूरा ब्रह्मज्ञान प्रदान कर रहे हैं, चाहे जो भी आये लेकिन कोई इसे किस रूप में ग्रहण करता है, यह तो संव्य उसे ही सोचना होगा| किसी परिस्थिति विशेष में किये गए अपने व्यवहार पर चिन्तन करके देखो की यदि मेरे स्थान पर सदगुरुदेव संव्य खड़े होते तो क्या वैसा ही व्यवहार करते जैसा मैंने किया है? यदि, इसका उतर 'हाँ' में है तो मैं आध्यात्मिक भी हूँ और जाग्रत भी, यदि उत्तर 'नहीं' मे है तो मैं क्या हूँ, इसका उत्तर संव्य मुझे ही सोचना होगा! इस आत्म्मूल्याकन की आदत बना लेनी चाहिए तभी हम दावे से कह पाएंगे की आध्यात्मिक जाग्रति यहाँ है|

 

.साभार : समागम समारिका, वर्ष : 2007 आध्यात्मिक जाग्रति : पेज 19