महायान का मौलिक अर्थ


महायान शब्द का सबसे पहले प्रयोग सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त, या मत, या ज्ञान को वर्णित करने के लिए किया गया था, जिसकी चेतन और अचेतन प्राणियों सहित ब्रह्माण्ड एक अभिव्यक्ति है, और केवल इसके माध्यम से ही वे मोक्ष या निर्वाण को प्राप्त कर सकते हैं. किसी धार्मिक सिद्धान्त को महायान का नाम नहीं दिया गया था, न ही किसी सैद्धान्तिक विवाद से इसका कोई सबंध था, यद्यपि बाद में एकप्रगतिशील वर्ग द्वारा इसका ऐसा प्रयोग  किया गया था।  
 
अशवघोष, महायान बौद्धधर्म के प्रथम व्याख्याता के रूप में हमें विदित हैं - ईसा के समय के लगभग आस-पास रहने वाले अशवघोष ने अपने श्रद्रोत्पादशास्त्र नामक धार्मिक=दार्शनिक ग्रन्थ में इस शब्द का प्रयोग किया था। 
 
उन्होंने इसका प्रयोग भूततथता  या धर्मकाय, महायान बौद्धधर्म के सर्वोत्कृष्ट सिद्धांत के पर्याय के रूप में किया गया था।  उन्होंने इसकी पहचान एक सर्वोत्कृष्ट सत, विशवास एंव सिद्धांत की तुलना एक साधन के साथ की थी जो हम सबको सुरक्षित रूप से संसार के जन्म एंव मृत्यु के समुद्र से निर्वाण के शाश्वत तट की और ले जाता है।  
 
इसके तुरंत बाद, बोद्धधर्म के सम्प्रदायों के बीच विवाद, पुरातनपंथी एंव प्रगतिशील सम्प्रदायों में ज़्यादा से ज़्यादा उद्घोषित होता चला गया; और जब यह अपनी चरम सीमा पर पहुंचा जो संभवत: नागार्जुन एंव अशवघोष का समय था, अर्थात, अशवघोष के कुछ शताब्दियों बाद एक प्रगतिशील वर्ग ने महायान के विरोध में हीनयान शब्द चतुराई से खोज निकाला. महायानियों ने इसे अपने सम्प्रदाय के नारे के रूप में स्वीकार कर लिया।  तब महायानियों ने हीनयानियों एंव तीर्थकरों की जबरदस्त रूप में यह कह कर निंदा की थी की वे  प्राणियों के लिए एक सार्वभौमिक निर्वाण को प्राप्त करने में असमर्थ थे।  
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