Bhagwad Geeta Ke chauthe adhyay se

Uploaded on 07/21/2011

श्रीमदभागवदगीता (चौथा अध्याय)
(श्री हरजीत निषाद जी)

भगवान श्री कृषण के मुख से उनके अवतार की बात सुन कर उनके जन्म का तत्त्व जानकर यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है की किस किस प्रकार और किन-किन कारणों से भगवान अवतार लेते हैं. भगवन श्री कृषण कहते हैं :

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् |

परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम, धर्मं संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे ||

हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप का सृजन करता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के समक्ष प्रकट होता हूँ.

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I

धर्मसंस्थापनाथार्य संभवामि युगे युगे I

 

साधुजनों का उद्धार करने के लिए, पापकर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ.

यहाँ भगवान ने यह दिखलाया है की मैं धर्म की हानि होने पर प्रकट होता हूँ. एक युग में एक ही बार प्रकट होता हूँ - ऐसा कोई नियम नहीं है.

इस प्रकार भगवान अपने  दिव्या जन्मों के अवसर, हेतु और उद्देश्य का वर्णन करके उन जन्मों की और उनमे किये जाने वाले  कर्मों की दिव्यता को तत्त्व से जानने वाला फल बतलाते हैं -

जन्म कर्म च में दिव्यमेव यो वेक्ति तत्वत: I

त्याकत्व देंह पुनर्जनम नेति ममोती सोडजूर्ण   I9I 

हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्या अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं - इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है.

भगवान का जन्म दिव्य है इस बात को तत्त्व से समझना आवश्यक है. भगवन के कर्म दिव्य हैं इसे भी तत्त्व से समझना है. इस प्रकार मुझे तत्त्व से जानने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता. यह अनादी परंपरा से चला आ रहा है.

वीतरागभयक्रोधा मन्मय मामुपाश्रिता: I

वहवो ज्ञानतपसा पूतामदभावमागता: I 10 I

जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझमे  अनन्य प्रेमपूर्वक स्थिर रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चुके हैं.

यहाँ 'मन्मय': का भाव उन भक्तो से है जिन्हें भगवन से अनन्य प्रेम हो जाने के कारण, सर्वत्र एक भगवन ही दिखने लगते हैं. जो भगवन की शरण ग्रहण  करके सर्वथा उनपर निर्भर हो जाते हैं, सदा संतुष्ट रहते हैं, भगवान की स्वरूप में ही समस्त कर्म करते हैं मामुपाश्रित: उनके लिए कहा गया है.

हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं I

यदि यह बात सत्य है तो फिर संसार में लोग भगवान को न भजकर अन्य देवताओं की उपासना क्यों करते हैं. इसे सपष्ट करते हुए भगवान कहते हैं.

इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं, क्योंकि उनको कर्मो से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है.

जिनकी सांसारिक भोगों में आसक्ति है वे अपने कर्मो द्वार स्त्री-पुत्र, धन-मकान मान-बडाई आदि की प्राप्ति के लिए देवताओं की उपासना करते रहते हैं I

चारों वर्णों (ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है. इस प्रकार सृष्टि रचना अदि का करता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू अकर्ता ही जान.

इसी प्रकार भगवान की भाँती ही फल की आसक्ति और कर्तापन के भाव से रहित होकर कर्म करने वाले ज्ञानी भी करता नहीं समझे जाते.

 

 

God Bless All is loading comments...