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सूफी फकीर - संत बुल्ले शाह जी
लेखक : श्री राम कुमार सेवक जी
(बुक (किताब) : हमारे सन्त महापुरुष, भाग 1 , पेज 62 )

दीपक घर में जलता है, घर को रोशन करता है. दहलीज पर जलता है तो बाहर और भीतर दोनों को प्रकाशित करता है. वही दीपक जब समुन्द्र तट पर स्थित ऊंची मीनार पर जलता है तब संसार भर को रौशनी देता है तथा प्रकाश सतम्भ कहलाता है. यह प्रकाश सतम्भ दूर से ही जहाजों को रास्ता दिखाकर साहिल तक पहुँचाने में मददगार साबित होता है.

अध्यात्मिक जगत में अनेकों ऐसे संत हुए, जिन्होंने अपने जीवन और वचनों से संसार का कल्याण किया. उनकी वाणियाँ प्रकाश सतम्भ की तरह, अज्ञान के अंधकार में भटक रही रूहों को ज्ञान के प्रकाश में आने को प्रेरित करने का कार्य कर रही हैं. पाकिस्तान स्तिथ पंजाब में ऐसे ही एक महान संत हुए - बुल्ले शाह जी (जिन्हें बुल्लेशाह कादरी शातारी भी कहा जाता है.) जिनकी काफियां लगभग तीन सदियों के बाद भी उसी ताज़गी, पाकीज़गी, श्रद्धा और प्यार से गायी जाती है.

साधको-ऋषियों-मुनियों के देश हिंदुस्तान में संत तुकाराम जी, तुलसीदास जी, कबीरदास जी, मीराबाई, सहजोबाई, पल्टू साहिब, दादू दयाल जी, रैदास जी, नामदेव जी, आदि अनेकों ऐसे संत हुए जिनकी वाणियाँ और उपदेश जन मानस पर गहरा असर रखते हैं. उनकी वाणियाँ बहुत श्रद्धा से पढ़ी, सुनी और गायी जाती हैं. इन सन्तों, फकीरों पर वेदांत, इस्लाम, सूफी  रूहानी साधना और, सदगुरु की कृपा के कारण उधार के विचारों व् पुस्तकीय अध्यन की जगह ये सन्त-सदगुरु से प्राप्त आत्मसाक्षात्कार के आधार पर ज्ञान और भक्ति की बारीकियों को न केवल बुलंदी से कहते रहे हैं, बल्कि मूल रास्ते से भटके श्रधालुओं को कभी सहजता से तो कभी कठोर शब्दों के द्वारा भी सही राह की तरफ लाने का कार्य भी करते रहे हैं. इसी श्रुंखला में बुल्लेशाह जी का नाम भी सत्य के प्रकश से दैदीप्यमान है.

बुल्लेशाह जी का जनम सन 1680 में रियासत बहावलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) के गाँव 'उच्च गलानिया' में हुआ. बाद में वे अपने माता-पिता के साथ मलकवाल  (तहसील साहिवाल) में अपने पूर्वजों के गाँव में रहने चले गए और अंतत: वे 'पांडोके) गाँव चले गए, जहाँ उनके पिता शाह मोहम्मद दरवेश गाँव की मस्जिद के मौलवी के साथ-साथ गाँव के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने का कार्य भी करते थे. वे अरबी, फारसी भाषा व् पाक कुरान के अच्छे विद्वान थे और उनका झुकाव अध्यात्म की और था.

बुल्लेशाह और उनकी बहन में परस्पर बहुत स्नेह था और दोनों ने ही अविवाहित रहकर भक्ति व् संयम वाला जीवन व्यतीत किया.

उच्च चरित्र का अनुसरण करने व् नेक जीवन जीने के कारण शाह मोहम्मद को 'दरवेश' कहकर आदर दिया जाता था. आज भी बुल्लेशाह के पिता की मज़ार 'पांडोके भट्टिया' में है, जहाँ हर साल उनका उर्स लगता है और रात को बुल्लेशाह की काफियां गायी जाती हैं. बुल्लेशाह ने अपने पिता के पास गाँव में ही प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की. बौद्धिक और चारित्रिक विशेषताओं से समृद्ध बुल्लेशाह ने उस समय के प्रसिद्ध नगर कसूर में जाकर ख्याति प्राप्त शिक्षक हजरत गुलाम मुर्तजा से उच्च शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने अपने श्रेष्ठ शिक्षकों की शिक्षा व् संगती का पूरा  लाभ लिया और अनेकों भाषाओं के श्रेष्ठ विद्वान बने.

बुल्लेशाह ने धर्मशास्त्रों  के अध्यन से मन में अध्यात्म की चंगरी पैदा की और ज्ञान प्राप्ति की तड़प उन्हें कामिल मुर्शद हज़रत शाह इनायत कादरी के द्वार तक खींच लाई.

वे सूफी फकीर थे और यह मानते थे की नेकी-बदी एक ही पेड़ की दो शाखाएं हैं जो मीठे और कड़वे फल देने वाली हैं.

  • नफ़स (मन) या खुदी (अहंकार) के खिलाफ़ लड़ा गया जेहाद (धार्मिक युद्ध) तलवार से लड़े गए युद्ध से कहीं अधिक प्रभावशाली  है.
  • सचा सूफी वही है, जो संसार को त्यागने की अपेक्षा निर्लेप भाव से गृहस्थी में रहकर अर्थात कर्तव्य पालन करके आदर्श जीवन जिए ताकि अन्य लोग भी इससे लाभ उठायें.
  • असाकति का त्याग अधिक शकतियों को जागृत करने में सहयोग है.
  • रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर प्रभुमय जीवन जीना चाहिए.
  • बाहरी वेशभूषा व् कर्मकांडों आदि में विश्वास की जगह मनुष्य को सदगुरु, सन्त या पीर द्वारा परमात्मा को पाने का प्रयास करना चाहिए.
  • परमात्मा, सदगुरु या पीर रूप में संसार में प्रकट होता है.
  • रज़ा, सबर, एकांत और फ़ख के साथ ह्रदय को उदार रखना चाहिए.

बुल्ले शाह के  गुरु इनायत शाह का डेरा लाहौर में था. अराईं जाति के इनायत शाह को अनायत लाहौरी के नाम से भी जाना जाता था, जो बागबानी, खेती-बाड़ी का कार्य करते थे. सन 1728 में उनकी मृत्यु लाहौर में हुयी, वहीँ उनका मकबरा भी बना हुआ है. बुल्लेशाह ने कई सिद्धियाँ प्राप्त की हुई थीं, मगर फिर भी प्रभु मिलन की प्यास बरक़रार थी. वे कामिल मुर्शद की तलाश में इनायत शाह की बगीची के पास पहुंचे और 'बिस्मिल्लाह' कहकर पेड़ों पर नज़र डाली तो आम धड़ाधड़ा नीचे गिरने शुरू हो गए. इनायत शाह पास में ही प्याज़ रोप रहे थे. उन्होंने बुल्लेशाह पर नज़र डाली और पूछा, "क्या चाहता है?" तथा "तेरा नाम क्या है?" बुल्लेशाह ने कहा, "मैं बुल्ला हूँ, रब को पाना चाहता हूँ." इनायत शाह ने कहा, "बुल्लेया रब दा की पाणा एधरों पुटना ओधर लाणा" अर्थात मन को संसार से हटाकर परमात्मा से जोड़ना है.

 
परमात्मा का ज्ञान पाकर बुल्लेशाह का जीवन मस्ती में गुज़रने लगा. सत्संग, सेवा, सुमिरन से बुल्लेशाह का आत्मिक विकास होता गया. सब भ्रम दूर हो गए, हकीकत का नूर बरसने लगा. रब और मुर्शद का भेद समाप्त हो गया. वे गा उठे-
            ओ रंग रंगिया गूडा रंगिया मुरशद वाली लाली ओ यार.

चलता.........................
सन्त जी, कुछ दिनों बाद आप जी बुल्लेशाह जी के जीवन के बारे में पूरा लेख पढ़ पाएंगे.