दातार कण-कण में हैं, लेकिन सभी चीजें परमात्मा नहीं


मानव अपनी अज्ञानता के कारण अपने सदा संग रहने वाले प्रभु को न जाने कहाँ-कहाँ ढूंढता फिर रहा है| जितने भी महापुरुष संत इस संसार में आए, उन्होंने इस निरंकार-दातार को अंग-संग ही जाना है, अनुभव किया है|

 

सन्तों ने भटकी हुई मानवता को, भटके हुए इन्सानों को सदैव यही बात समझाने की कोशिश की है, की तू इस निराकार-प्रभु-परमात्मा को किसी एक स्थान पर निश्चित समझता है, लेकिन यह प्रभु तो कण-कण में व्याप्त और हर जगह मौजूद है| परन्तु इसकी प्राप्ति तभी संभव है, जब तुझे ज्ञान की नज़र मिल जाती है, दिव्य चक्षु तुम्हें प्राप्त हो जाते हैं| जब देखकर मन इसे धारण कर लेता है, मन इसे अपना लेता है|

 

जिस तरह से एक फूल में सर्वत्र सुगंध मौजूद होती है, उसी तरह से निरंकार सर्वत्र मौजूद है| हम शरबत का गिलास पीते हैं , शरबत उस तमाम गिलास में होता है| जो भी पीता है, एक-एक घूँट के साथ, उसके मुह शर्बत जा रहा होता है| इसी तरह ये परमात्मा, यह निराकार, यह दातार भी कण-कण में व्याप्त है| इंसान तू इसे जंगलों में क्यों सोच लेता है? तू क्यों इसे गुफाओं, कंदराओं में सोचे बैठा है? इसकी खोज तो महापुरुष-संत सदा करते रहे, लेकिन अंत में निबेड़ा कहाँ पर जाकर हुआ? जब ब्रह्मज्ञानी की शरण मिल गई, जब ज्ञानी के साथ नाता जुड़ गया, तभी इस अज्ञान के अंधकार का विनाश हो गया| यह भ्रम दूर हो गया की निराकार परमात्मा कहीं दूर है| यह सातवें आसमान पर है, कहीं गुफा-कंदराओं में है या फिर पर्वत परमात्मा है या फिर सूरज ही परमात्मा है या जल ही परमात्मा है, ये सारे भ्रम दूर हो गए| यह जानकारी हासिल हो गई, की ये सभी कुछ दातार में ही समाया हुआ है| दातार कण-कण में हैं, लेकिन सभी चीजें परमात्मा नहीं| यह इनसे न्यारा है| यह सब खेल रच के भी इनसे न्यारा रहता है| ये  सभी चीज़ें जो दृष्टिमान है, मिट जाती है, इनके ऊपर तो अग्नि का भी असर है, तेज धार वाले अस्त्र-शास्त्र का भी असर है| हर एक प्रकार से जल का भी उसके ऊपर असर है| इसलिए इसको कहा गया है की 'आदि सचु, जुगादि सच, है भि सच, नानक होसी भि सचि|' साध संगत! कहने का भाव की इस निरंकार, इस दातार प्रभु को निकट करके जाना गया है| इसकी जानकारी निकट दिखा दी गई है|

 

गावै को जापै दिसें दूरि|

गावै को वेखै हादरा हदूरि||

एक इसकी महिमा गा रहे हैं, इसको दूर समझ कर, लेकिन जो भक्त होते हैं वे इसको अंग-संग जानकार संबोधित करते हैं| इसको अंग-संग जानकार इसका सिमरन करते हैं|

 

 'बिन देखे दी भक्ति करना अम्बर नू हाथ लाणा ऐ|'

 

बगैर देखे की गई भक्ति करना आकाश को हाथ लगाने के सामान कठिन है| जब ब्रह्मज्ञानी साधु का संग मिल जाता है, तभी इस निरंकार का इस प्रकार अनुभव होता है -

तू भरपूरि जानिया मैं दूरि|

जो कुछ करी सु तेरे हदूरि||

 

तू तो भरपूर है, कण-कण में समाया हुआ है, मैं तुझे दूरि माने बैठा था, मैं तुझे बहुत फासले पर माने बैठा था| एक इंसान सामने बैठा हुआ है, फासला नहीं है| लेकिन पर्दा आँखों के सामने आ जाए तो बहुत दूरि हो जाती है| हालाँकि दूरि कुछ नहीं, परन्तु परदे ने बहुत दूरि बढ़ा दी| इसी तरह अज्ञान का अंधकार परमात्मा को निकट होते हुए भी दूर कर देता है|

 

अज्ञानता के अंधकार में ही इंसान इस निरंकार दातार को दूर माने बैठा है| महापुरषों, सन्तों ने हमेशा संसार की इस अज्ञानता को दूर किया है| इस अंधकार का विनाश ज्ञान की रौशनी से हो जाता है| इसका विनाश और किसी तरह से नहीं होता| अंधकार का विनाश क्या कोई बोझा ढोने से होता है? कोई टोकरियाँ भर-भर कर कमरे में से अन्धकार बाहर किया जा सकता है? ऐसा नहीं, अन्धकार जब भी दूर हुआ है, रौशनी के द्वारा ही दूर होता है| ज्ञान की ज्योति जहाँ पर जल जाती है, वहाँ पर तमाम अँधेरे मिट जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं|

 

---निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

साभार : बुक : विचार प्रवाह, भाग-2, पेज 29-30-31

 



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